सरकार का 'प्रायोजित आंदोलन' का आरोप: जनता के जख्मों पर नमक या जिम्मेदारी से भागने का रास्ता?

सरकार का 'प्रायोजित आंदोलन' का आरोप: जनता के जख्मों पर नमक या जिम्मेदारी से भागने का रास्ता?
हाल ही में चल रहे आंदोलन पर सरकार ने एक बहुत ही पुराना और आसान रास्ता अपनाया है—"यह आंदोलन किसी खास राजनीतिक दल द्वारा प्रायोजित (Sponsored) है।" सरकार को शायद ऐसा लगता है कि यह ठप्पा लगाते ही उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। लेकिन सरकार को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में निष्पक्ष न्याय देने की प्राथमिक और संवैधानिक जिम्मेदारी सरकार की होती है, जनता की नहीं।
१. जनता के समर्थन पर आरोप लगाना हास्यास्पद
जनता किसे समर्थन देती है, किसके मंच पर खड़ी होती है या किसका झंडा हाथ में थामती है—यह इस देश के हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। आंदोलन को किसी विपक्षी दल ने समर्थन दे दिया, तो इससे मूल अन्याय या असली मुद्दा झूठा नहीं हो जाता। इसके उलट, सरकार द्वारा ऐसा आरोप लगाना अपनी ही नाकामी और बेवकूफी का प्रदर्शन करने जैसा है।
२. क्या जनता अन्याय सहती रहे?
अगर सरकार समय पर न्याय नहीं करती, तो क्या जनता शांत बैठकर अन्याय सहती रहे?
 सवाल यह है: जब कोई राजनीतिक दल उस अन्याय का फायदा उठाने या उसकी राजनीति करने आगे आता है, तब तक सरकार सोई रहती है क्या?
 दूसरा सवाल: जब तक जनाक्रोश फूट नहीं पड़ता, तब तक 'कुछ हुआ ही नहीं' ऐसा नाटक सरकार कब तक करती रहेगी?
अगर सरकार ने सही समय पर न्याय दिया होता, तो किसी भी राजनीतिक दल को उस अन्याय पर 'राजनीति' करने का मौका ही नहीं मिलता। विपक्षी दल राजनीति करेंगे ही, क्योंकि वह उनका काम है; लेकिन सरकार अपना सबसे मुख्य काम—न्याय देना—क्यों भूल गई?
३. 'जनता के लिए सरकार' या 'सरकार के लिए जनता'?
लोकतंत्र की बुनियाद बेहद सरल और स्पष्ट है: सरकार जनता के लिए होती है, जनता सरकार के लिए नहीं।
आज जनता को बिना डरे, पूरी निडरता से सरकार को यह चेतावनी देने का समय आ गया है:
"हम किसी दल का समर्थन करें या न करें, इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। हम टैक्स भरते हैं, हमने आपको कुर्सी पर बिठाया है। इसलिए राजनीति का यह नाटक बंद कीजिए और निष्पक्ष न्याय कीजिए!"

आंदोलन को 'प्रायोजित' कहकर नीचा दिखाना, असल मुद्दे से ध्यान भटकाने की एक नाकाम कोशिश भर है। सरकार को आरोपों की यह ओछी राजनीति छोड़कर, जिस जनता ने उन्हें सत्ता में बिठाया है, उसे न्याय देने का अपना बुनियादी कर्तव्य निभाना चाहिए। क्योंकि आखिरकार, सत्ता का घमंड तोड़ने की ताकत इसी जनता के हाथों में होती है।

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