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सत्ताधारी हों या विपक्षी दल: सभी को 'नेता' नहीं, बल्कि 'जनसेवक' ही कहें! - शाम सारस्वत

सत्ताधारी हों या विपक्षी दल: सभी को 'नेता' नहीं, बल्कि 'जनसेवक' ही कहें!  - शाम सारस्वत भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है। हमारे लोकतंत्र की नींव ही "जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन" के सिद्धांत पर रखी गई है। संविधान की प्रस्तावना में "हम भारत के लोग..." शब्दों से यह स्पष्ट किया गया है कि देश की सर्वोच्च सत्ता किसी व्यक्ति, दल या मंत्री में नहीं, बल्कि आम जनता में निहित है। लेकिन आज की राजनीतिक संस्कृति में, चाहे सत्ताधारी हों या विपक्षी दल, खुद को 'नेता', 'मंत्री' या 'सत्ताधीश' समझने की होड़ लगी दिखाई देती है। इस सामंती मानसिकता पर प्रहार करते हुए सामाजिक विश्लेषक शाम सारस्वत ने यह स्पष्ट मांग की है कि: *"देश के किसी भी दल के प्रतिनिधि को 'नेता' न कहकर केवल 'लोकसेवक' या 'जनसेवक' के रूप में ही आधिकारिक सार्वजनिक पहचान दी जानी चाहिए।" 'नेता' नहीं, 'जनसेवक': संविधान की मूल आत्मा शाम सारस्वत के अनुसार, 'नेता' शब्द से स्वामित्व और अहंकार की गंध आती है...

सरकार का 'प्रायोजित आंदोलन' का आरोप: जनता के जख्मों पर नमक या जिम्मेदारी से भागने का रास्ता?

सरकार का 'प्रायोजित आंदोलन' का आरोप: जनता के जख्मों पर नमक या जिम्मेदारी से भागने का रास्ता? हाल ही में चल रहे आंदोलन पर सरकार ने एक बहुत ही पुराना और आसान रास्ता अपनाया है—"यह आंदोलन किसी खास राजनीतिक दल द्वारा प्रायोजित (Sponsored) है।" सरकार को शायद ऐसा लगता है कि यह ठप्पा लगाते ही उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। लेकिन सरकार को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में निष्पक्ष न्याय देने की प्राथमिक और संवैधानिक जिम्मेदारी सरकार की होती है, जनता की नहीं। १. जनता के समर्थन पर आरोप लगाना हास्यास्पद जनता किसे समर्थन देती है, किसके मंच पर खड़ी होती है या किसका झंडा हाथ में थामती है—यह इस देश के हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। आंदोलन को किसी विपक्षी दल ने समर्थन दे दिया, तो इससे मूल अन्याय या असली मुद्दा झूठा नहीं हो जाता। इसके उलट, सरकार द्वारा ऐसा आरोप लगाना अपनी ही नाकामी और बेवकूफी का प्रदर्शन करने जैसा है। २. क्या जनता अन्याय सहती रहे? अगर सरकार समय पर न्याय नहीं करती, तो क्या जनता शांत बैठकर अन्याय सहती रहे?  सवाल यह है: जब कोई राजनीतिक दल उस अन्याय का फायदा उ...

संकट से उपजी अस्मिता : नीट का घपला और नई पीढ़ी की हुंकार — श्याम सारस्वत

## संकट से उपजी अस्मिता : नीट का घपला और नई पीढ़ी की हुंकार **— श्याम सारस्वत** "भगवान जो करता है अच्छे के लिए करता है," इस कहावत का अहसास इतिहास हमें समय-समय पर कराता है। जब समाज या देश किसी अत्यंत गंभीर संकट से गुजरता है, तो उसी संकट के गर्भ से एक नई क्रांति या बदलाव का जन्म होता है। देश के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को दांव पर लगाने वाला नीट (NEET) परीक्षा का घपला और पेपर लीक का प्रकरण इसी का एक ज्वलंत उदाहरण है। वर्षानुवर्षे दिन-रात एक करके, दिनभर पढ़ाई और रात में सपने देखने वाले प्रामाणिक विद्यार्थियों की मेहनत पर जब धांधली और भ्रष्टाचार का पानी फिर गया, तो पूरा देश हिल गया। दो-दो बार परीक्षा देने के बाद भी उचित परिणाम न मिलना यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं है, बल्कि देश की गुणवत्ता पर हुआ एक बड़ा आघात है। --- ### राजनीतिक व्यवस्था का यथार्थ और भ्रम का बुलबुला कुछ वर्षों पूर्व देश में एक ऐसा चलन बना दिया गया था कि एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा या पार्टी के बिना यह देश चलना संभव ही नहीं है। कांग्रेस या अन्य विकल्पों के बाद भारत कौन चलाएगा? जब ऐसा प्रश्न पूछा जा रहा था, तब भाज...

'वॉटर, गटर और मीटर': जनता के लिए स्थाई अभिशाप या राजनेताओं की पीढ़ियां पालने वाला धंधा?

'वॉटर, गटर और मीटर': जनता के लिए स्थाई अभिशाप या राजनेताओं की पीढ़ियां पालने वाला धंधा? - श्याम सारस्वत भारतीय लोकतंत्र में चुनावों का उत्सव आता-जाता रहता है। सत्ताधारियों के चेहरे बदलते हैं, विपक्षी दलों के रुख बदलते हैं और भाषणों के शब्द बदलते हैं। कभी देश को 'महासत्ता' बनाने के दावे किए जाते हैं, तो कभी 'विश्वगुरु' बनाने का ढिंढोरा पीटकर जनता को सम्मोहन (भ्रम) में रखा जाता है। लेकिन इस चुनावी चमक-दमक के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि आजादी के दशक बीत जाने के बाद भी आम जनता आज भी तीन बुनियादी शब्दों के इर्द-गिर्द फंसी हुई है: 'वॉटर' (पानी), 'गटर' (स्वच्छता और ड्रेनेज) और 'मीटर' (बिजली, टैक्स और महंगाई)! आज यह सवाल केवल प्रशासनिक विफलता का नहीं रह गया है, बल्कि एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा बन चुका है। ये तीन समस्याएं सुलझाने के लिए राजनेताओं के पास कभी इच्छाशक्ति नहीं रही, बल्कि इन्हें जानबूझकर उलझाए रखा गया है। क्योंकि, अगर ये समस्याएं सुलझ गईं, तो राजनेताओं की दुकानें बंद हो जाएंगी! आम जनता की इन्हीं बुनियादी जरूरतों को समस्या का रूप दे...