जनता बनाम पूंजीवाद #राघव चड्ढा #RaghavChadha

 लोकतंत्र का सम्मान या पूंजीपतियों की तरफदारी?

आज की राजनीतिक परिस्थिति में एक खेदजनक तस्वीर उभर रही है। संसद लोकतंत्र का वह पवित्र मंदिर है, जहाँ आम जनता के हितों के लिए कानून बनने चाहिए। लेकिन, वर्तमान में कई राजनीतिक दल और नेता आम जनता के लिए नहीं, बल्कि बड़े पूंजीपतियों (Capitalists) के लिए अपने पद का दुरुपयोग करते दिख रहे हैं। जब कोई जनप्रतिनिधि आम आदमी की जेब काटने वाली कॉर्पोरेट कंपनियों के खिलाफ बोलता है, तो उसकी आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी संसद और लोकतंत्र का अपमान है।

राघव चड्ढा: पद आएंगे और जाएंगे, पर जनता की आवाज़ 'खामोश' करना नामुमकिन!

संसद के सबसे युवा, प्रखर और अध्ययनशील चेहरों में से एक राघव चड्ढा को राज्यसभा में 'उपनेता' के पद से हटाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। इस कार्रवाई पर चड्ढा की प्रतिक्रिया— "खामोश कराया है, हारा नहीं; सैलाब बनकर आऊंगा"—महज एक बयान नहीं, बल्कि स्थापित व्यवस्था और पूंजीपरस्त राजनीति को दी गई एक बड़ी चुनौती है।

वे मुद्दे जिन्होंने स्थापित व्यवस्था की नींव हिला दी...

राघव चड्ढा ने संसद में जो मुद्दे उठाए, वे सीधे जनता के रोजमर्रा के जीवन और पूंजीपतियों की मुनाफाखोरी से जुड़े हैं:

28 दिनों के रिचार्ज की लूट: जब महीना 30 या 31 दिनों का होता है, तो मोबाइल कंपनियां रिचार्ज सिर्फ 28 दिनों का ही क्यों देती हैं? इस एक सवाल से उन्होंने टेलीकॉम कंपनियों के हजारों करोड़ों के मुनाफे का गणित उजागर कर दिया। कॉर्पोरेट जगत की इस नफेखोरी पर उंगली उठाने का साहस उन्होंने दिखाया।

खाने में मिलावट और सार्वजनिक स्वास्थ्य: मुनाफा कमाने के लिए लोगों की जान से खेलने वाले मिलावटखोरों के खिलाफ उन्होंने संसद में कड़ी आवाज उठाई। आम आदमी को शुद्ध भोजन मिलना उसका मौलिक अधिकार है, इसे उन्होंने पूरी दृढ़ता से रखा।

डिलीवरी बॉयज का शोषण: '10 मिनट में डिलीवरी' के नाम पर बड़ी कंपनियां अपने डिलीवरी पार्टनर्स का जो शोषण कर रही हैं, उस आधुनिक गुलामी पर चड्ढा ने प्रकाश डाला। उन्होंने साफ किया कि कंपनियों के मुनाफे से ज्यादा जरूरी उन कामगारों की सुरक्षा और जीवन है।

'सैलाब बनकर आऊंगा' 

जब कोई नेता कहता है कि वह 'सैलाब' (तूफान) बनकर लौटेगा, तो उसका अर्थ यह है कि अब वह पद की सीमाओं में न बंधकर सीधे जनता की अदालत में जाएगा। पूंजीपतियों के इशारों पर नाचने वाली राजनीति जब संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाती है, तब जनता के बीच से ही ऐसे संघर्ष की चिंगारी निकलती है। जनता के मुद्दे उठाने वाले को तकनीकी कारणों से रोकना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है।

"संसद जनता की समस्याओं को सुलझाने के लिए है, पूंजीपतियों के

 हितों की रक्षा के लिए नहीं। जब पद का दुरुपयोग होता है, तब जनता 

का आक्रोश अनिवार्य है।"

राघव चड्ढा को उपनेता पद से हटाना केवल एक पद का विषय नहीं है, बल्कि यह 'जनता बनाम पूंजीवाद' के संघर्ष का हिस्सा है। जिन्होंने रिचार्ज की लूट का हिसाब मांगा, खाने में मिलावट के खिलाफ मोर्चा खोला और मेहनतकश डिलीवरी बॉय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, ऐसे नेता को 'खामोश' करना असंभव है।

आज राघव चड्ढा शायद उस पद पर न हों, लेकिन उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे आज भी हर भारतीय के मन में घर कर गए हैं। आने वाले समय में यह 'सैलाब' निश्चित रूप से आम आदमी के न्याय के लिए नई ऊर्जा के साथ आएगा, इसमें कोई दो राय नहीं है।

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