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सनातन sanatan

सनातन संस्कृति: प्रकृति के साथ सामंजस्य और जीवन जीने की कला – श्याम सारस्वत अध्यात्म और सांस्कृतिक विषयों के विचारक श्याम सारस्वत ने हाल ही में सनातन संस्कृति के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सनातन धर्म केवल कर्मकांडों का समूह नहीं है, बल्कि यह इस पृथ्वी पर एक मनुष्य के रूप में गरिमापूर्ण और संतुलित जीवन जीने की एक विस्तृत नियमावली है। मानवता और प्रकृति का अटूट संबंध सनातन संस्कृति का मुख्य ध्येय यह सिखाना है कि एक इंसान को पृथ्वी पर किस प्रकार रहना चाहिए। उन्होंने कहा: "सनातन धर्म इस बारे में है कि कैसे एक इंसान के रूप में पृथ्वी पर रहना है और प्रकृति के साथ सद्भाव (Harmony) में रहना है।" उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है। जब हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहते हैं, तभी हम उसके 'ऐश्वर्य' (विभूति और संपदा) का वास्तविक आनंद ले सकते हैं। यह जीवन शैली किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए है जो इस धरा पर जन्म लेता है। योग: आत्म-साक्षात्कार का पहला सोपान इस जीवन...

जब कुर्सी विनाश का अस्त्र बनती है!

जब कुर्सी विनाश का अस्त्र बनती है! सत्ताधारियों का 'मतिभ्रम'  और दुनिया का 'रक्तपात':  जब कुर्सी विनाश का अस्त्र  बनती है! हाल ही में सोमालिया के सैन्य प्रमुख की ओर से सामने आई मांग—जिसमें उन्होंने तुर्की से 'एक अरब डॉलर और सुंदर युवतियों' की मांग की—यह घटना भले ही ऊपर से हास्यास्पद लगे, लेकिन यह एक भीषण वास्तविकता की ओर इशारा करती है। जब देश की रक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रमुख अपनी व्यक्तिगत वासनाओं और अतार्किक मांगों के लिए देश को दांव पर लगा देते हैं, तब उस राष्ट्र के पतन की शुरुआत होती है। लेकिन यह समस्या केवल एक देश तक सीमित नहीं है; आज दुनिया भर के कई शक्तिशाली राष्ट्रों के प्रमुख अपने 'सनकी' निर्णयों के कारण विश्व को तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर ले जा रहे हैं। 1. सत्ता का उन्माद या मानसिक अस्थिरता? इतिहास पर नजर डालें तो दिखता है कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठने के बाद कई नेताओं को लगने लगता है कि वे ईश्वर से भी श्रेष्ठ हैं। सोमालिया के सैन्य प्रमुख की धमकी हो या उत्तर कोरिया के किम जोंग उन का परमाणु शक्ति प्रदर्शन, इन सबके पीछे एक ही सुप...

लोकतांत्रिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता Democratic tolerance and Freedom of expression

 लोकतांत्रिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आज राज्यसभा में एक ओर शरद पवार जैसे अत्यंत अनुभवी नेता सदस्यता की शपथ ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राघव चड्ढा जैसे युवा सांसदों को अपनी बात रखने से रोकने की खबरें चर्चा में हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, लोकतांत्रिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर केंद्रित यह विचार : लोकतंत्र के मंदिर में विचारों की स्वतंत्रता केवल एक मूल्य नहीं बल्कि उसकी नींव है। एवलिन बीट्रिस हॉल ने वॉल्टेयर के विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए कहा था, "मैं आपके विचारों से असहमत हो सकता हूँ, लेकिन आपके विचार व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा मैं अंतिम सांस तक करूँगा।" यह कथन आज राज्यसभा के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। एवलिन बीट्रिस हॉल (छद्म नाम: स्टीफन जी. टैलेंटायर) द्वारा लिखित पुस्तक "द फ्रेंड्स ऑफ वोल्टेयर" (The Friends of Voltaire, 1906) में उन्होंने यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ लिखी थीं। यह कथन वोल्टेयर के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उनके अटूट विश्वास को दर्शाता है। लोकतंत्र की आत्मा: वैचारिक मतभेद का सम्मान और वॉल्टेयर की विरासत ल...

जनता बनाम पूंजीवाद #राघव चड्ढा #RaghavChadha

 लोकतंत्र का सम्मान या पूंजीपतियों की तरफदारी? आज की राजनीतिक परिस्थिति में एक खेदजनक तस्वीर उभर रही है। संसद लोकतंत्र का वह पवित्र मंदिर है, जहाँ आम जनता के हितों के लिए कानून बनने चाहिए। लेकिन, वर्तमान में कई राजनीतिक दल और नेता आम जनता के लिए नहीं, बल्कि बड़े पूंजीपतियों (Capitalists) के लिए अपने पद का दुरुपयोग करते दिख रहे हैं। जब कोई जनप्रतिनिधि आम आदमी की जेब काटने वाली कॉर्पोरेट कंपनियों के खिलाफ बोलता है, तो उसकी आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी संसद और लोकतंत्र का अपमान है। राघव चड्ढा: पद आएंगे और जाएंगे, पर जनता की आवाज़ 'खामोश' करना नामुमकिन! संसद के सबसे युवा, प्रखर और अध्ययनशील चेहरों में से एक राघव चड्ढा को राज्यसभा में 'उपनेता' के पद से हटाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। इस कार्रवाई पर चड्ढा की प्रतिक्रिया— "खामोश कराया है, हारा नहीं; सैलाब बनकर आऊंगा"—महज एक बयान नहीं, बल्कि स्थापित व्यवस्था और पूंजीपरस्त राजनीति को दी गई एक बड़ी चुनौती है। वे मुद्दे जिन्होंने स्थापित व्यवस्था की नींव हिला दी....

Right to Privacy निजता का अधिकार

​"दोष सिद्ध होने तक हर कोई निर्दोष: मेडिकल  गोपनीयता और विचाराधीन आरोपी के अधिकार"  निजता का अधिकार और मेडिकल गोपनीयता: अपराधी के संदर्भ में भी एक मौलिक सुरक्षा किसी भी व्यक्ति की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी या मेडिकल रिपोर्ट उसकी निजता का सबसे संवेदनशील हिस्सा होती है। इसे बिना संबंधित व्यक्ति की सहमति के सार्वजनिक करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह निजता के अधिकार (Right to Privacy) का गंभीर उल्लंघन भी है। भारतीय कानून और मानवाधिकारों के परिप्रेक्ष्य में यह सुरक्षा हर नागरिक को प्राप्त है, चाहे उसकी सामाजिक या कानूनी स्थिति कुछ भी हो। निजता का संवैधानिक और कानूनी आधार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत, सर्वोच्च न्यायालय ने 'पुट्टस्वामी मामले' में निजता को एक मौलिक अधिकार घोषित किया है। इसके अतिरिक्त:  * डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act 2023): यह कानून स्वास्थ्य डेटा को 'संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा' मानता है। इसे बिना अनुमति साझा करना कानूनी दंड का आधार बनता है।  * चिकित्सा नैतिकता: डॉक्टर और अस्पताल 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' और मेडिकल काउ...

प्रकृति का मौन प्रतिशोध

धरती का सीना, बारूद का धुआँ: क्या प्रकृति का  दोहन ही आधुनिक युद्धों की असली वजह है? आज की दुनिया में जब हम समाचारों में युद्ध, मिसाइल हमलों और देशों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हैं, तो हमें लगता है कि यह केवल राजनीति या विचारधारा की लड़ाई है। लेकिन यदि हम थोड़ा गहरा उतरें, तो एक कड़वा सच सामने आता है—जहाँ-जहाँ धरती का अत्यधिक दोहन हो रहा है, वहीं अशांति का सबसे गहरा साया है। प्रकृति और युद्ध के इस घातक अंतर्संबंध को समझना अब केवल पर्यावरणविदों का काम नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है। 1. संसाधनों की अंधी दौड़: विकास या विनाश? इतिहास गवाह है कि धरती के भीतर छिपे खनिज—चाहे वह तेल हो, गैस हो या कीमती धातुएँ—अक्सर 'वरदान' की जगह 'अभिशाप' साबित हुए हैं। खाड़ी देशों (Gulf Countries) का उदाहरण हमारे सामने है। दशकों से इन देशों ने धरती के सीने से अरबों बैरल तेल निकाला है। इस 'अत्यधिक दोहन' ने न केवल भूगर्भीय संतुलन को बिगाड़ा है, बल्कि इन क्षेत्रों को वैश्विक शक्तियों की 'शतरंज की बिसात' बना दिया है। 2. अमेरिका और ईरान: उपभोग बनाम नियंत्रण की जंग ईरा...

लोकतंत्र बनाम व्यक्तिपूजा

लोकतंत्र बनाम व्यक्तिपूजा  : छह दशक की राजनीति और नए नेतृत्व का सवाल क्या लंबे समय तक सत्ता में बने रहना लोकतंत्र के लिए चुनौती बन सकता है ? — श्याम सारस्वत , सामाजिक कार्यकर्ता एवं राजनीतिक विश्लेषक , जालना भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता , बहुलता और समय-समय पर होने वाला नेतृत्व परिवर्तन माना जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता किसी एक व्यक्ति या समूह की स्थायी संपत्ति नहीं होती , बल्कि जनता के जनादेश के अनुसार समय-समय पर बदलती रहती है। इसी परिवर्तनशीलता के कारण लोकतंत्र को एक जीवंत और गतिशील व्यवस्था कहा जाता है। लेकिन भारतीय राजनीति में कई ऐसे नेता भी रहे हैं जिन्होंने दशकों तक सक्रिय राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी है। महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता   शरद पवार   का लगभग छह दशक लंबा राजनीतिक सफर इसी का प्रमुख उदाहरण है। वर्ष   1967 में पहली बार विधायक बनने के साथ शुरू हुई उनकी राजनीतिक यात्रा   आज भी जारी है। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री , केंद्रीय मंत्री , रक्षा मंत्री और कृषि मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है औ...