लोकतांत्रिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता Democratic tolerance and Freedom of expression
लोकतांत्रिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
आज राज्यसभा में एक ओर शरद पवार जैसे अत्यंत अनुभवी नेता सदस्यता की शपथ ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राघव चड्ढा जैसे युवा सांसदों को अपनी बात रखने से रोकने की खबरें चर्चा में हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, लोकतांत्रिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर केंद्रित यह विचार :
लोकतंत्र के मंदिर में विचारों की स्वतंत्रता केवल एक मूल्य नहीं बल्कि उसकी नींव है। एवलिन बीट्रिस हॉल ने वॉल्टेयर के विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए कहा था, "मैं आपके विचारों से असहमत हो सकता हूँ, लेकिन आपके विचार व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा मैं अंतिम सांस तक करूँगा।" यह कथन आज राज्यसभा के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हो गया है।
एवलिन बीट्रिस हॉल (छद्म नाम: स्टीफन जी. टैलेंटायर) द्वारा लिखित पुस्तक "द फ्रेंड्स ऑफ वोल्टेयर" (The Friends of Voltaire, 1906) में उन्होंने यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ लिखी थीं। यह कथन वोल्टेयर के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उनके अटूट विश्वास को दर्शाता है।
लोकतंत्र की आत्मा: वैचारिक मतभेद का सम्मान और वॉल्टेयर की विरासत
लोकतंत्र में संसद को 'चर्चा का सदन' माना जाता है। यहाँ विचारधाराओं की लड़ाई होती है, शब्दों का युद्ध होता है, लेकिन इन सबके केंद्र में होती है अभिव्यक्ति | वॉल्टेयर के दर्शन को आधार बनाकर एवलिन हॉल ने जो संदेश दिया था, वह आज संसदीय कार्यवाही के शोर में कहीं खोता हुआ प्रतीत हो रहा है। जब किसी सदस्य को, चाहे वह सत्तापक्ष का हो या विपक्ष का, बोलने से रोका जाता है, तो वह केवल एक व्यक्ति की आवाज़ नहीं दबाई जाती, बल्कि उस व्यक्ति को चुनकर भेजने वाले लाखों मतदाताओं की आवाज़ का गला घोंटा जाता है।
अनुभव और उत्साह का संगम
आज राज्यसभा में शरद पवार शपथ ले रहे हैं। पवार जैसे नेताओं ने संसदीय राजनीति के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उनकी उपस्थिति वाले सदन में जब राघव चड्ढा जैसे युवा सदस्यों को अपने विचार रखने से रोका जाता है या उनके अधिकारों पर अंकुश लगाया जाता है, तब यह प्रश्न उठता है कि—क्या हम वास्तव में लोकतंत्र के उस महान सिद्धांत का पालन कर रहे हैं जहाँ विरोधी विचारों का सम्मान किया जाता है?
दलीय राजनीति और व्यक्तिगत अधिकार
अक्सर राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार अपनी भूमिका बदलते रहते हैं। परंतु, वॉल्टेयर का विचार किसी एक दल तक सीमित नहीं है, वह सार्वभौमिक है। सदन को सदस्यों को केवल 'संख्या बल' के रूप में नहीं, बल्कि 'विचार रखने वाले प्रतिनिधि' के रूप में देखना चाहिए। राघव चड्ढा को बोलने से रोकना केवल एक पार्टी का विषय नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में संवाद की कमी को दर्शाता है।
सदन की गरिमा शोर-शराबे में नहीं, बल्कि सार्थक संवाद में निहित है। जिस दिन हम दूसरे का मत सुनने का साहस खो देंगे, उसी दिन लोकतंत्र की इमारत में दरारें पड़नी शुरू हो जाएंगी। इसीलिए, आज फिर से उसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता है— "भले ही मुझे तुम्हारा मत स्वीकार न हो, पर उसे व्यक्त करने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा मैं अंत तक करूँगा।"
यदि हम वॉल्टेयर के विचारों पर गर्व करते हैं, तो हमें असहमत होने वाले व्यक्ति की आवाज़ दबाने के बजाय, उसे सुनने और उस पर तर्कसंगत उत्तर देने का धैर्य रखना होगा। शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और युवा पीढ़ी का उत्साह, दोनों का सम्मान बना रहना ही वास्तविक लोकतंत्र है।
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